मौन स्वामिगल , कुम्बकोनम, तमिल नाडु


भारतवर्ष में अनेक महान संत  जन्मे है। १८ वि सदी एक महान संत है श्री मौन गुरु स्वामिगल। ये कुम्बकोनम, तमिल नाडु से सम्बन्ध रखते है साधारणतः मौनगुरु एक व्यापक नाम है जो बोहोत से संत तथा पैगम्बरों को दिया जा सकता है मौन का अर्थ है चुप्पी या बोलना आज भी इनकी महा समाधी बोहोत पर्यटकों और भक्तो को खीच लाती है यह महासमाधि कुम्बेश्वर मंदिर कुम्बकोनम (शहर का नाम इस मंदिर के नाम पर रखा गया) में है यहाँ का परिसर शांत और नीरव है एक छोटा सा शिवलिंग इस अधिस्थान की महिमा बढ़ाता  है
कांची के परमाचार्य ने अपनी रचना देवतहिं कुरल (खंड ) में मौनगुरु की बोहोत चर्चा की है ये इसके मौन की तुलना मोक्ष और निर्वाणा से करते है इस स्थिति को समझाते हुए परमाचार्य ने उदहारण दिए है - श्री सदाशिव ब्रह्मेन्द्र, श्री मौन गुरु स्वामिगल और श्री रमन महर्षि इन तीनो महान आत्माओ में से मोँगुरु स्वामिगल सिर्फ अपने निकट जानो में ही जाने जाते है ये सारे संत निर्विकल्प समाधी और सहज समाधी के बीच ही जीवन व्यापन करते थे
स्वामिगल प्रथम तिरूभुवनम (कुम्बकोनम से -१० किमी) में रहते है और फिर वें कुम्बकोनम आये जब स्वामी विवेकानंद कुम्बकोनम आये तब उन्होंने स्वामिगल से भेट की।  एनी बीसेंट  तथा अरुणडेल भी यहाँ स्वामिगल से मिलने चुके है एनी बीसेंट ने इस समाधी पर मेहराब (आर्क) लगवाया जो आज तक स्वामिगल की समाधी को अलंकृत करता है स्वामिगल ने अपने नश्वर देह को २२ अप्रैल १८९९ में त्यागा परमाचार्य की रचना का एक अनुवादित भाग निन्मलिखित है - "मौन गुरु घंटो तक अपनी समाधी में लीन रहते ठे. उनका देह तथा आँखे खुली या बंद रहती पर पलके कभी नहीं झपकती अगर कोई उनकी आँखों को उंगलियो से बंद करने की कोशिश करता तब भी वें नहीं झपकती "अन्ना उन्हें बल प्रयोग करके खिलाना पड़त. उनके भक्त बलपूर्वक उन्हें खाना खिलने की कोशिश करते कभी कभार वें खा लेते या कभी खाना वैसे का वैसा ही रह जाता चींटियाँ उस अन्ना के आस पास घूमती और उनके मुख पर काटती ; फिर भी वें कभी समाधी भंग कर उठे नहीं कभी कभार भक्त उनकी जीभ पर शक्कर रख देते पर आश्चर्यजनक बात यह है की उनके मुह में कभी पानी नहीं भर आते| ये बात दर्शाती है की स्वामिगल अपनी सभी चेतनाओं को जीत चुके थे|

Sri Mounaguru samadhi TN
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